अबकी बार सुधार जाओ यार
मौजूदा राजनीतिक पारा उत्तर भारत की गर्मी की तरह ही उफान पर है, लगभग बिना विपक्ष संसद में बेतरतीब फैसले लेने वाली सरकार के सामने अब एक मजबूत विपक्ष खड़ा है।
कहावत तो जरूर सुनी होगी, "बारह गाँव का चौधरी अस्सी गाँव का राव, अपने काम न आवे तो ऐसी-तैसी में जाव।" मोदी सरकार को इस बार की जीत कुछ खास रास नहीं आ रही है, आए भी कैसे? "अबकी बार 400 पार" का नारा कुछ इस प्रकार धड़ाम से गिरा जैसे "आसमान से बिजली"।
बहरहाल सरकार तो बन गई। परंतु अब सरकार चलाना कितना आसान होगा यह तो भविष्य ही बताएगा। किसान आंदोलन, अग्निवीर, सामान्य नागरिक संहिता, पर फिर एक बार सवाल खड़े होंगे। इंदौर में 2 लाख लोगों ने नोटा को चुना। जिसे इंदौर की राजनीति ने पहली बार देखा। उत्तरप्रदेश ने तो सरकार के होश ही उड़ा दिए।
जिस प्रकार कपड़े लाॅड्री से धुल कर स्वच्छ हो जाते हैं उसी प्रकार बड़े बड़े नेताओं का मेला दामन भी पार्टी विशेष में शामिल होने के बाद कुछ साफ ही दिखाई दे जाते हैं। विपक्ष न होने के बावजूद मीडिया का विपक्ष से ही सवाल पूछना। सत्ता पक्ष की चाटुकारिता करना शायद जनता को रास नहीं आया।
हालही में थप्पड़ खाई अभिनेत्री कंगना को उनके दिए गए अफलातून बयान पर भी शुरू से विचार करने पर मजबूर कर दिया होगा, और यह सबक होगा उनके लिए जो बिना सिर पैर की बयान बाजी करते हैं। वैसे CRPF से न्यायोचित कार्यवाही अपेक्षित है।
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