बेचारी जेब्रा क्रॉसिंग

आज सुबह पिताजी को उनके दफ्तर छोड़ने के लिए मैं और पिताजी घर से ठीक 8:30 बजे अपने वाहन से उनके दफ्तर के लिए निकले। पिताजी सरकारी कर्मचारी हैं और हमेशा हेलमेट पहनने और यातायात व्यवस्था के नियमों को मानने की सलाह देते हैं, वो आधुनिक युवा पीढ़ी के वाहन संचालन प्रवृत्ति से भी थोड़ा संभल कर चलने की हिदायत देते हैं और उनकी हिदायत वाकई में मेरे बहुत काम आती है।

घर से पिताजी के दफ्तर की दूरी लगभग दस किलोमीटर की है,और इतनी दूरी में मुझे, शहर के कुछ मुख्य चौराहों को पार करना ही होता है,पर जब मैं राह में लोगों को उनके वाहन संचालन के तौर-तरीकों को देखता हूँ तो मुझे बहुत ही हैरानी होती है।

मुझे कई बार यह देखने को मिलता है कि चौराहे पर रेड लाइट के चलते मात्र 30 सेकेंड में लोग अपना धैर्य खोने लगते हैं और एक मिनट बाद तो कोई इंतजार ही नहीं करता। यदि कोई ट्रैफिक पुलिस वाला नहीं होता है तो इधर-उधर देखकर लोग रेड लाइट पार कर निकल जाते हैं।

अपनी बालअवस्था से लेकर युवाअवस्था तक में मैंने इंदौर के बड़े से बड़े चौराहे तथा छोटी गली-मोहल्लों से खुद को बहुत अच्छे से अवगत करा लिया है,अतः मैं यहाँ के लोगों को भी उतना ही बेहतर जानता हूँ, यहाँ के लोग जहाँ एक ओर सफाई और स्वच्छता अभियान को लेकर बहुत ही निष्ठापूर्ण व्यवहार अपनाते हैं, वहीं दूसरी ओर वे यातायात नियमों की अवहेलना करने में बिलकुल नहीं कतराते। 

जहाँ एक ओर उन्होंने अपने देश को स्वच्छता अभियान के प्रति अपनी निष्ठा से प्रभावित किया है, तो वहीं दूसरी ओर यातायात संचालन की व्यवस्था से निराश भी किया है, परंतु यातायात नियमों की अवहेलना करने का यह विषय केवल 'इंदौर' का ही नही है, अपितु भारत में विभिन्न राज्यों तथा बड़े शहरों में यातायात व्यवस्था की हालत कुछ इसी प्रकार की ही नजर आती है।

फिर चाहे चौराहे पर ट्रैफिक नियंत्रण सिग्नल की बात हो या सिर पर हेलमेट की , नाबालिकों को द्वारा वाहन संचालन की बात हो या सड़कों पर बने गड्ढों की, इस व्यवस्था पर लोग किसी भी प्रकार की रियायत नहीं बरतना चाह रहे हैं। अवहेलना की इस श्रृंखला में, मैं आप का ध्यान बेचारी ज़ेबरा क्रोसिंग की व्यवस्था पर भी आकर्षित करने की कोशिश करूँगा।

जेबरा क्रासिंग की शुरुवात सर्वप्रथम ब्रिटेन के बर्कशायर में अक्टूबर 1948 में की गयी थी। लगातार बढ़ती वाहनों की संख्या से सड़कों पर दुर्घटना के मद्दे नजर जेम्स कॉलघन ने लोगों को सुरक्षित सड़क पार कराने के मकसद से ट्रांसपोर्ट एन्ड रिसर्च लैब को 'ज़ेबरा क्रासिंग' की नई तरकीब सुझाई थी।

उनके सुझाव के अनुसार जेबरा क्रासिंग का नियम बनाया गया जिसका आशय यह था की "वाहन चालक" पैदल सड़क पार करने वालों को 'सड़क पार' करने की प्राथमिकता दें, चूँकि सफेद काली धारिया दूर से ही नजर आती है इसलिए यही पट्टिया चुनी गयी और सफ़ेद तथा काला रंग का यह निशान जेबरा से मेल खाता था इसलिए इसका नाम "जेबरा क्रासिंग" रखा गया, फिर धीरे-धीरे इसका प्रचलन अन्य देशों में भी होता गया।

भारत में भी जेबरा क्रासिंग का प्रचलन तो हुआ परंतु इसे समझने का प्रयत्न शायद नही हुआ, एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 46 फीसदी सड़क हादसों की वजह जेब्रा क्रॉसिंग पर गलत तरीके से चलना है। 

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि ज्यादातर सड़क हादसों में देखा गया है कि वाहन चालक जेबरा क्रॉसिंग पर पैदल चलने वालों को जगह ही नहीं देते हैं, जगह की कमी से वो मुख्य सड़क मार्ग पर चलने पर विवश हो जाते हैं, और यही बहुत से सड़क दुर्घटना की वजह भी बनती हैं। 

यही नही अधिकांश जगहों पर तो मानों जेबरा क्रासिंग चौराहों पर केवल दिखावे के लिए ही बनाई जाती है अर्थात वे या तो दोनों और किसी बड़े डिवाइडर से घिरी होती हैं या अपने मार्ग में किसी प्रकार की बाधा का सामना कर रही होती हैं।

कहीं-कहीं तो ज़ेबरा क्रासिंग वाहनों के निरंतर आवागमन से मिट जाती है,परंतु उसका पुनः निर्माण कार्य समय रहते होता ही नही, जिससे लोगों को विवश होकर अपना मार्ग बदलना पड़ता है। 

फ़िलहाल इस बात पर प्रश्नचिन्ह अंकित है कि ज़ेबरा क्रासिंग के मार्ग का आधुनिक तकनिकी द्वारा मूल्यांकन क्यों नही किया जाता?

क्यों समय-समय पर उनके निर्माण कार्य तथा बनावटी ढंग का निरीक्षण नही किया जाता? 

क्यों इन नियमों के पीछे जागरूकता का आभाव नजर आता है? 

इन समस्यों का अध्ययन करते हुए"स्वीडन के '

क्रिस्टर हेडन' ने पाया कि जहां जेब्रा क्रासिंग को रंग दिया गया था। वहां हादसे 4 से 20 फीसदी तक ज्यादा हुए और जहां जेबरा क्रासिंग को रंगने के साथ-साथ कुछेक इंच उठा दिया गया, वहां हादसों की संख्या 42 फीसदी कम हो गई। दरअसल, जहां रोड फ्लैट होती है वहां रंगने के बावजूद ड्राइवर रफ्तार कम नहीं करते जबकि पैदल यात्री वहां से बेफिक्र होकर गुजरते हैं और हादसे के शिकार बनते हैं। जिस चौराहे पर जेबरा क्रासिंग रंगी नहीं होती वहां पैदल यात्री सचेत रहते हैं"।

यहाँ यह गौरतलब है कि जो लाइसेंस धारी चालक हैं,उन्हें तो लाइसेंस लेने से पहले (आर. टी.ओ) द्वारा जारी परीक्षा में हिस्सा लेना होता है, और उससे सम्बंधित परीक्षा में नियमों के सही उत्तर दे कर ही लाइसेंस की प्राप्ति की जा सकती है, परंतु वो नियम केवल कागज तक ही समेट दिए जाते हैं, यही नहीं यातायात के नियमों का पालन करने की शिक्षा का पाठ तो हम बाल अवस्था से पढ़ना शुरू कर देते हैं, परंतु फिर भी अपनी जान जोखिम में डालकर हम बेबाक होकर अपने वाहनों का संचालन करते हैं और हादसों का शिकार हो जाते हैं। 

इन हादसों पर सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की सलाना रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल होने वाले औसतन साढ़े चार लाख सड़क हादसों में डेढ़ लाख से भी ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है। दुनिया भर में होने वाले सड़क हादसों में से करीब बारह फीसदी हादसे भारत में ही होते हैं, जो दुनिया के किसी भी देश के मुकाबले सर्वाधिक हैं।

सिर्फ यही नहीं संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन के मुताबिक सड़क दुर्घटनाओं के कारण भारत को हर साल अट्ठावन अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है।इस आधार पर यह राशि भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के तीन फीसद से भी अधिक बैठती है।

यह भी उल्लेखनीय है कि हमारे यहां जितने लोगों की मौत आतंकी घटनाओं की वजह से होती है, उससे ज्यादा मौतों की एकमात्र वजह सड़क हादसे ही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक शराब पीकर वाहन चलाने वालों के खिलाफ बनाए गए कानून को अच्छी तरह अमल में लाया जाए तो सड़क हादसों में बीस फीसद तक की कमी लाई जा सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी एक रिपोर्ट में यह भी कहा है कि चालक अगर अपनी रफ्तार में पांच फीसद की भी कमी लाता है, तो जानलेवा दुर्घटना की संभावना को तीस फीसद तक कम किया जा सकता है।मई 2011 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2011-2020 की समयावधि को ‘सड़क सुरक्षा दशक’ के रूप में मनाने की घोषणा की थी। इसका लक्ष्य दशक के अंत तक यानी 2020 तक दुनियाभर में होने वाले सड़क हादसों में पचास फीसद तक कमी लाना है।

पुलिस के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट के मुताबिक, सड़क हादसों के पीछे सबसे प्रमुख वजह चालकों की लापरवाही है।परंतु इन हादसों को तब-तक नहीं रोका जा सकता है, जब-तक की लोगों द्वारा ट्रैफिक नियमों को किसी झंझट की तरह समझा जायेगा। यातायात व्यवस्था के ये नियम हमारे लिए ही बने हैं। हमें इन नियमों का उचित पालन करना चाहिए तथा आने वाली पीढ़ी को एक सुगठित यातायात व्यवस्था की सौगात देनी चाहिए।

हुकूमत से भी सड़क हादसों की गंभीरता को समझते हुए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि रोजाना करीब चार सौ लोगों की जान लेने वाले सड़क हादसों पर लगाम लगाने के लिए राज्यों को केंद्रीय सड़क कोष के एक हिस्से का इस्तेमाल करना चाहिए और सर्वाधिक संभावित दुर्घटना वाली जगहों को दुरुस्त करना चाहिए।

गडकरी ने कहा कि हम न सिर्फ राष्ट्रीय राजमार्गों पर बल्कि राज्यों के राजमार्गों पर भी हादसों को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। सभी राज्य सरकारों से कहा गया है कि केंद्रीय सड़क कोष की दस फीसद राशि सर्वाधिक दुर्घटना वाली जगहों में निहित दुर्घटना के कारणों को दूर करने के लिए इस्तेमाल करें। 

सरकार ने विभिन्न दुर्गम क्षेत्रों को भी सड़क सेवा से जोड़ने पर उल्लेखनीय कार्य किया है, जिसमे 2017 में कई प्रमुख कार्य हुए।असम में धोला सादिया पुल और जम्‍मू-कश्‍मीर में चेनानी नाशरी दूरदराज के क्षेत्रों को जोड़ने के लिए खोले गए जिससे उस क्षेत्र के सामाजिक, आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्‍त हुआ।

इस वर्ष में ही देश के सबसे बड़े राजमार्ग विकास कार्यक्रम "भारतमाला परियोजना" का शुभारंभ हुआ। यही नही टोल संचालित हस्‍तांतरण (टीओटी) योजना के जरिए सार्वजनिक कोष से अपनी सड़क संपत्तियों का निर्माण कर रहा है। ब्लैक स्पॉट का भी सुधार किया गया है तथा अब तक 789 दुर्घटना जोखिम वाले ब्‍लैक स्‍पॉटों की पहचान की है। इनमें से 189 ब्‍लैक स्‍पॉट का सुधार किया जा चुका है।

सरकार द्वारा सड़क हादसों को कम करने की हर संभव कोशिशें की जा रही हैं।परंतु यह कोशिशें तभी सफल हो सकती हैं, जब लोगों द्वारा यातायात नियमों का पालन सुव्यवस्थित ढंग से किया जायेगा, जब ट्रैफिक सिग्नल को आदर्श मानकर उसकी अवहेलना नहीं की जायेगी,जब कार का सीट बेल्ट किसी बंधन की तरह नजर नही आएगा, तथा जब हेलमेट सिर पर बोझ नही लगेगा और मादक पदार्थ का सेवन करने से पहले अपने परिवार का चेहरा सामने नजर नहीं आएगा। समाज को बदलने की शुरुआत हमेशा खुद से ही होनी चाहिए, इसलिए मैं अपने पाठक वर्ग से यही अनुरोध करता हूँ ,की शुरुआत खुद से करें और अपनी युवा पीढ़ी को एक अच्छी सीख दें।आखिर कब-तक ज़ेबरा क्रासिंग यूँ ही बेचारी बनी रहेगी??

"बनती रहेंगी सड़कें प्यारे,  

 चलते रहेंगे काम।

 तू नियम का पालन करता

 चल, 

 तेरी बची रहेगी जान"।

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